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समान नागरिक संहिता (UCC) – एक राष्ट्र एक संहिता

UCC

समान नागरिक संहिता क्या दर्शाता है?

-> एक समान नागरिक संहिता होने का मतलब है कि व्यक्तिगत कानूनों का एक ही सेट सभी नागरिकों पर उनके धर्म के बावजूद समान रूप से लागू होते हैं।
-> फिलहाल अभी, हिंदू और मुसलमानों के लिए व्यक्तिगत कानून भिन्न-भिन्न हैं। निजी कानून के अंतर्गत संपत्ति, उत्तराधिकार ,विरासत ,तलाक और विवाह आदि क्षेत्र आते हैं।

बहस पिछले कुछ वर्षों में:

-> यह पहली बार 1930 के दशक में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन के व्दारा उठाया गया उनकी मांग थी कि महिलाओं को भी समान अधिकार प्राप्त हो प्रमुख क्षेत्रों में जैसे कि धर्म में, शादी, विरासत में, तलाक, गोद लेने और उत्तराधिकार आदि।

-> हर कुछ वर्षों में, समान नागरिक संहिता से संबंधित मुद्दे, आस-पास के बहस की वजह से फिर से ताजा हो जाते हैं। शाह बानो के मामले में पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने कहा कि अनुच्छेद 44 एक ‘मृत पत्र’ बन गया है और यह राज्य का कर्तव्य है, कि समान सिविल संहिता को लागू करे क्योंकि उनके पास विधायी क्षमता है।

समान नागरिक संहिता और भारतीय संविधान:

संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता के लिए राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत के रूप में एक प्रावधान है, जिसमें कहा गया है कि राज्य पूरे देश के नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा। “

समान नागरिक संहिता के पक्ष में तर्क:

-> यह असली धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देता है – भारत में हमारे पास अभी चयनात्मक धर्मनिरपेक्षता है जिसका अर्थ है कि कुछ क्षेत्रों में हम धर्मनिरपेक्ष हैं और कुछ क्षेत्रों में नहीं हैं।

-> सभी भारतीयों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए अभी हमारे पास विशिष्ट धर्मों के आधार पर व्यक्तिगत कानून हैं, जिसका मतलब है कि मुसलमान भारत में कई बार शादी कर सकते हैं, वहीं पर एक हिंदू या एक ईसाई को एेसा करने पर मुकदमा चलाया जा सकता हैं।
-> यह महिलाओं को अधिक अधिकार देता है – हमारा समाज पितृसत्तात्मक और अहंकारी है और पुराने धार्मिक नियमों को पारिवारिक जीवन पर शासन जारी रखने की अनुमति देकर हम सब भारतीय महिलाओं को अधीनता और दुर्व्यवहारिता की तरफ धकेल रहे हैं

-> यह वोट बैंक की राजनीति को कम करने में मदद करेगा – देश में समान नागरिक संहिता का ना होना, लोकतंत्र के लिए हानिकारक है।

-> यह भारत की सही समझ को एकीकृत करता है – एक समान नागरिक संहिता आजादी से अब तक की तुलना में भारत को अधिक समेकित करने में मदद करेगा।

-> यह लैंगिक समानता को बढ़ावा देगा – यह आमतौर पर देखा जाता है कि लगभग सभी धर्मों के व्यक्तिगत कानून महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण होते हैं।

समान नागरिक संहिता के खिलाफ तर्क:

-> भारत में विविधता के कारण व्यावहारिक कठिनाइयां

-> कई समुदायों द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता पर अतिक्रमण के रूप में समान नागरिक संहिता को देखना।

-> व्यक्तिगत मामलों में राज्य का हस्तक्षेप – संविधान, किसी एक विकल्प के लिए धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। समान नियमों के संहिताकरण के साथ, धर्म की स्वतंत्रता का दायरा भी कम हो जाएगा।

-> यह क्रियान्वित करने के लिए संवेदनशील और कठिन कार्य है – अगर यह ठीक से प्रबंधित नहीं जाता है तो यह सांप्रदायिक हिंसा के रूप में अधिक विनाशकारी हो सकता है।

नया प्रगतिशील समान नागरिक संहिता मसौदा:

-> मसौदा इस विचार पर आधारित है कि एक समान नागरिक संहिता बहुसंख्यक के बजाय प्रगतिशील होना चाहिए।

-> असमानता और लिंग भेदभाव और धार्मिक भेदभाव से संबंधित मुद्दों का पता लगाएं।

->  व्यक्तिगत अधिकारों पर जोर देने के साथ ही ड्राफ्ट भारतीयों की विविधता की चिंताओं का हल भी निकाले।

आगे की राह:

समान नागरिक संहिता भारत के लिए आवश्यक है, लेकिन जन सहमति के आधार पर होना चाहिए, विभिन्न समुदायों के विविध विचारों को शामिल करना चाहिए और व्यापक रूप से बहस के बाद होना चाहिए।

इस समय ज़रूरत इस बात कि है कि सरकार को इस कानून के कार्यान्वयन के लिए धीरे-धीरे मार्ग प्रशस्त करना चाहिए जिससे कि बड़ी संख्या में अशांति पैदा ना हो सके और इसके साथ-साथ सरकार को समान नागरिक संहिता को लागू करने के लाभों के बारे में लोगों को संवेदीकरण और शिक्षित करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए -जो कि प्रगतिशील समान नागरिक संहिता के मसौदे के खंड 10 में प्रदान किए गए।

 

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