जाति व्यवस्था – लुई ड्यूमाँ (Caste System – Louis Dumont) (UPSC-2015,13,10,09,08,02)

Louis

लुई ड्यूमाँ के दृष्टिकोण मुख्यतः जाति व्यवस्था की विचारधारा से संबंधित थे।
लुई ड्यूमाँ का कहना है कि जाति स्तरीकरण का एक रूप नहीं है, लेकिन असमानता का एक विशेष रूप है जिसका सार समाजशास्त्रीयों द्वारा समझा जाना चाहिए।
जाति व्यवस्था की परिभाषा:

  • लुई ड्यूमाँ ने जाति व्यवस्था के अपने अध्ययन में भारत विद्या शास्त्रीय दृष्टि और संरचनात्मक उपागम दोनों का प्रयोग किया है और ‘भारत के समाजशास्त्र’ को समाजशास्त्र एवं भारत विद्याशास्त्र के संगम पर स्थापित करने का प्रयास किया है।
  • लुई ड्यूमाँ के अनुसार भारत एक ऐसा धार्मिक समाज है जो जाति व्यवस्था की शुध्द असमानता व्यवस्था से परिचालित है और असमानता पवित्रता और अपवित्रता की विरोधी वैचारिकी पर आधारित है।
  • लुई ड्यूमाँ ने जाति व्यवस्था में निहित असमानता की व्याख्या हेतु वैचारिकी को प्राथमिक माना हैं। इस वैचारिकी का स्रोत धर्म शास्त्रीय ग्रंथों में हैं।

लुई ड्यूमाँ जाति असमानता और पवित्रता व विविधता की अवधारणा:

  • लुई ड्यूमाँ ने विश्व को पूर्वी और पश्चिमी दो समाजों में विभक्त करते हुए समानतैा को पश्चिमी समाज की केंद्रीय विशेषता माना है और असमानता को पूर्वी समाज मुख्यता भारतीय समाज की मुख्य विशेषता के रूप में स्वीकार किया है।
  • लुई ड्यूमाँ के अनुसार पवित्रता और अपवित्रता सापेक्षिक स्थिति हैं
  • लुई ड्यूमाँ ने जाति व्यवस्था के अपने विश्लेषण में इस पवित्रता एवं अपवित्रता के संदर्भ में दो प्रकार की अपवित्रता की चर्चा की हैं।
    • अस्थायी अपवित्रता यह क्षणिक होती है जिसको कुछ धार्मिक कर्मकांडों के पश्चात दूर किया जा सकता है — जैसे जन्म एवं मृत्यु के समय की पवित्रता।
    • स्थायी अपवित्रता – यह चिरस्थाई ,जन्म से मृत्यु तक बने रहने वाली अपवित्रता है जो भारतीय समाज की परंपरागत वर्ण व्यवस्था में देखने को मिलती है।
  • लुई ड्यूमाँ जाति को रेखीय व्यवस्था के रूप में देखते हैं जिसमें आरोहण कार्यक्रम जुड़ा हुआ है और जो हिंदू समाज का जाति या उप जातियों में असमानता या विभाजन का घोतक है।
  • लुई ड्यूमाँ ने इस पवित्र एवं अपवित्रता की वैचारिकी को आधार बनाकर हिंदू विवाह ,शारीरिक संपर्क एवं खान पान से जुड़े प्रतिबंधों एवं नियमों की व्याख्या की हैजैसे अपनी ही उपजाति में विवाह करने वाली या गोत्र बर्हिविवाह के नियमों का पालन करने वाली जातियां उन का उल्लंघन करने वालों की अपेक्षा पवित्र एवं श्रेष्ठ मानी जाती हैं ।
  • लुई ड्यूमाँ का कहना है कि असमानता भारतीय समाज की मौलिक विशेषता है जिसमें पवित्रता एवं अपवित्रता का विचार इतना प्रभावी एवं विस्तृत है कि इसके पहुंच के बाहर कुछ भी नहीं हैं।
  • लुई ड्यूमाँ ने भारतीय गांव में प्रचलित जजमानी व्यवस्था की भी असमानता एवं पवित्रता व अपवित्रता के संदर्भ में समझने का प्रयास किया है ,उनके अनुसार जाति व्यवस्था एक विशिष्ट श्रम विभाजन की प्रणाली है जिसमें विभिन्न जाति समूह अपनी विशिष्ट व्यावसायिकता के आधार पर पेशा ग्रहण किए हुए हैं ।
  • भारत में श्रम विभाजन का यह परंपरागत रुप निजी लाभ के उद्देश्य पर केंद्रित एवं बाजार की शक्तियों द्वारा नियंत्रित आधुनिक औद्योगिक श्रम विभाजन से भिन्न है
  • जजमानी व्यवस्था प्रत्येक विशेषीकृत सेवाओं के लिए विशेषज्ञों के परिवार पर आधारित श्रम विभाजन की वह प्रणाली है जो पीढ़ीगत  पारिवारिक संबंधों पर आधारित होती है ।

इस तरह लुई ड्यूमाँ ने जजमानी व्यवस्था को एक धार्मिक संस्था के रूप में वर्णित किया है और यह स्थापित किया है कि जजमानी व्यवस्था भूस्वामियों एवं भूमिहीनों के बीच राजनीतिक , आर्थिक प्रभुत्व का आधार रही हैं।
आलोचनात्मक मूल्यांकन (Critical evaluation):-

  • लुई ड्यूमाँ की मान्यता है कि पूर्व का समाज असमानता पर आधारित है और पश्चिमी समाज समानता पर आधारित हैं। लुई ड्यूमाँ का यह विभाजन तर्कसंगत नहीं है
  • लुई ड्यूमाँ के विश्लेषण में शक्ति एवं प्रस्थिति के मध्य पृथक्करण दिखाई पड़ता है जहां प्रस्थिति सदैव शक्ति से पृथक रहती है और साथ ही शक्ति पर प्रशस्ति का नियंत्रण सदैव बना रहता हैं।
  • लुई ड्यूमाँ ने जाति व्यवस्था के विश्लेषण को भारतीय विद्याशास्त्रीय स्रोतो का सहारा लेते हुए ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण पर आधारित किया है और पवित्रता एवं अपवित्रता के एक पक्ष पर बल देते हुए जाति के सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक पक्षों को बिल्कुल भुला दिया है ।
  • लुई ड्यूमाँ असमानता पर आधारित भारतीय समाज को आदर्श हमारी मानता है जहां जजमानी व्यवस्था द्वारा निम्न जातियों को आर्थिक सुरक्षा मिलती है तथा उच्च जातियों के लोग निम्न जातियों को पुत्र के समान मानते हैं और उनके हितों की रक्षा करते हैं ।
  • लुई ड्यूमाँ ने भारतीय संस्कृति में निहित असमानता की प्रवृत्ति के आधार पर भारतीय समाज में विभाजन एवं असमानता को दर्शाया है ,इस प्रकार लुई ड्यूमाँ ने ना केवल भारतीय सामाजिक असमानता के भौतिक एवं आर्थिक पक्षों की अवहेलना की है बल्कि यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि भारत में समानता एवं समानवाद संभव नहीं हैं।
  • दीपांकर गुप्ता का मानना है की पवित्रता एवं अपवित्रता के बीच लुई ड्यूमाँ द्वारा बताया गया आधारभूत विरोध सार्वभौमिक नहीं हैं।
  • लुई ड्यूमाँ ने जाति व्यवस्था को मूल्यों के तार्किक एवं सुसंगत व्यवस्था के रुप में दर्शाया है मार्क्सवादियों ने इसकी आलोचना की हैं।

 

निष्कर्ष:

लुई ड्यूमा का यह विचार न केवल जाति व्यवस्था के सांस्कृतिक पक्षों के विश्लेषण हेतु एक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है बल्कि असमानता पर आधारित भारतीय समाज एवं पश्चात समाज की तुलनात्मक भिन्नता को समझने में भी सहायक हैं।

ड्यूमोंट के मॉडल में अनुष्ठान की स्थिति के लिए सामाजिक स्तरीकरण के राजनीतिक और आर्थिक मानदंडों का अधीनता औपनिवेशिक और समकालीन समय में सामाजिक परिवर्तन के महत्व को कम करता है।

 

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