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जाति व्यवस्था – श्रीनिवासन (Sanskritization) (UPSC-2015,13)

sanskritization

जाति व्यवस्था की परिभाषा:

  • श्रीनिवासन ने जाती व्यवस्था के बारे में प्राचीन धर्म ग्रंथों पर आधारित दृष्टि तथा क्षेत्र कार्य पर आधारित दृष्टि में अंतर किया है।
  • श्रीनिवासन ने भारतीय सामाजिक संस्थाओं, जैसे– जाति व्यवस्था के अध्ययन में किताबी दृष्टिकोण को अस्वीकार करके तथा क्षेत्र कार्य दृष्टिकोण का समर्थन करके भारतीय समाजशास्त्र को अनुभवी तथ्यों पर आधारित करने का प्रयास किया है ।
  • श्रीनिवासन ने दक्षिण भारत के मैसूर के रामपुर गांव का क्षेत्रीय अध्ययन किया है ।

श्रीनिवासन की संस्कृतिकरण की अवधारणा:

  • श्रीनिवासन के अनुसार संस्कृति करण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत निम्न हिंदू जातियाँ या जनजातियां अपने से उच्च जाति के रहन सहन को अपनाकर जातीय असमानता में अपनी प्रस्थिति को ऊंचा उठाने का प्रयास करती हैं।
  • इस प्रक्रिया में निम्न जातियां अच्छी ना समझी जाने वाली क्रियाओं को –जैसे मांस खाना, सूअर पालन, मदिरा सेवन आदि का त्याग कर देती हैै।
  • एक या दो पीढी तक दावा करने के बाद उनके दावे को स्वीकार भी कर लिया जाता है।

संस्कृतिकरण के लक्षण:

  • संस्कृतिकरण के आदर्श मॉडल एक से अधिक हो सकते हैं –जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या कोई स्थानीय प्रभु जाति।
  • संस्कृतिकरण की प्रक्रिया सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों को उत्पन्न करती हैं।
  • संस्कृतिकरण का संबंध किसी व्यक्ति या परिवार से ना होकर किसी समूह से होता है।
  • संस्कृतिकरण के माध्यम से किसी जाति समूह की स्थिति आसपास की जातियों से कुछ ऊपर उड़ जाती हैं परंतु स्वयं जाति व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
  • यह एक पद मुल्क परिवर्तन की प्रक्रिया है जो संरचना मूलक परिवर्तन उत्पन्न नहीं करती है।
  • संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में एक निम्न जाति समूह जनजाति या अन्य समूह एक या दो पीढ़ी तक स्वयं से उच्च जाति की जीवन शैली की दिशा में अपना समाजीकरण करता है ताकि भविष्य में उसको स्थानीय समुदाय में उच्च स्थान प्राप्त हो जाए।

 

संस्कृतिकरण के परिणाम या प्रभाव:

  • इससे जातीय प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष में वृद्धि होती है क्योंकि उच्च जातियां संस्कृतिकरण को रोकने का प्रयास करती हैं।
  • इससे निम्न जातीय समूहों की जीवन शैली में परिवर्तन होता है और उनके द्वारा अच्छी ना समझी जाने वाली क्रियाओं को छोड़ दिया जाता है।
  • संस्कृतिकरण से निम्न जातीय समूहों की स्थिति में सुधार तथा जाति गतिशीलता संभव होती है।
  • इससे महिलाओं की स्थिति में गिरावट आती है।

संस्कृतिकरण के सहायक तत्व: 

  • नगर, मंदिर एवं तीर्थ स्थानों पर लोगों का एकत्रीकरण तथा सांस्कृतिक विचारों एवं विश्वासों का आदान प्रदान भी संस्कृतिकरण को तीव्र करने में सहायक हुआ है।
  • शिक्षा, नेतृत्व तथा संस्तरण प्रणाली में ऊपर उठने की अभिलाषा ने भी संस्कृतिकरण को गति प्रदान की है।
  • संचार और यातायात के साधनों के विकास में दलित जातियों में चेतना का प्रसार किया है।
  • सामाजिक सुधार आंदोलन ने निम्न जातियों की स्थिति में सुधार के प्रयत्न किए हैं इस से प्रेरित होकर उन्होंने उच्च जातियों के बराबर अधिकार पाने का प्रयत्न आरंभ कर दिया है।
  • कर्मकांडों से वैदिक मंत्रोच्चारण की पृथकता ने भी निम्न जातियों हेतु कर्मकांडों को आसान बना दिया है।
  • आर्थिक एवं राजनीतिक स्थिति में सुधार से निम्न वर्गों को अपनी जीवनशैली उच्च जातियों जैसी करने में सहायता मिली है।

आलोचनात्मक मूल्यांकन:

  • योगेंद्र सिंह के अनुसार संस्कृतिकरण केवल सांस्कृतिक पक्षों पर केंद्रित है और इसमें गैर सांस्कृतिक परंपराओं की उपेक्षा की गई है।
  • क्योंकि आलोचकों का कहना है कि संस्कृतिकरण मात्र स्थिति परिवर्तन का विश्लेषण करता है अतः यह एक सीमित अवधारणा है।
  • योगेंद्र सिंह का मानना है कि संस्कृतिकरण की अवधारणा भारतीय जाति व्यवस्था के अंतर्गत उत्पन्न नवीन प्रवृत्ति पुन संस्कृतिग्रहण की व्याख्या नहीं कर पाती है।
  • इस अवधारणा में सार्वभौमिकता का अभाव पाया जाता है साथ ही यह पद्धति शास्त्रीय दृष्टिकोण से भी त्रुटिपूर्ण है।
  • मजूमदार का मानना है कि भारत में जाति व्यवस्था के अंतर्गत वी संस्कृतिकरण की प्रक्रिया भी क्रियाशील रही है जिसके अंतर्गत उच्च जाति के लोग अपने से निम्न जाति या जनजाति के साथ यौन संपर्क करके अपनी स्थिति अवनति हेतु क्रियाशील रहे हैं।

निष्कर्ष:

क्योंकि आज सामाजिक स्तरीकरण की व्यवस्था में व्यक्ति के प्रस्थिति के निर्धारक के रूप में आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के महत्व में वृद्धि हुई है और जाति के महत्व में कमी आई है इसलिए संस्कृतिकरण की प्रक्रिया अब अधिक महत्वपूर्ण नहीं रह गई है फिर भी वर्तमान भारतीय समाज में अपेक्षाकृत कम व्यवहारिक होते हुए भी संस्कृतिकरण की अवधारणा जाति गतिशीलता एवं परिवर्तन के विश्लेषण हेतु एक दृष्टिकोण प्रदान करती है।

 

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