Skip to content
Advertisements

कार्ल मार्क्स- ऐतिहासिक भौतिकवाद (Karl Marx- Historical Materialism) (UPSC Mains-2017,2013,1986)

KM - HM
मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद का परिचय:

  • यह सिद्धांत भौतिकवाद की मान्यताओं को द्वंद्वात्मक पद्धति के साथ मिलाकर सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को समझने का प्रयत्न करता है।
  • ऐतिहासिक भौतिकवाद मार्क्स द्वारा प्रस्तुत इतिहास एवं सामाजिक परिवर्तन का एक सिद्धांत है जो इतिहास, संस्कृति और सामाजिक परिवर्तन की समस्त व्याख्या आदर्शवाद के विपरीत भौतिक मूल्यों पर आधारित ‘उत्पादन प्रणाली’ के आधार पर करता है।
  • ऐतिहासिक भौतिकवाद की यह विशेषता है कि यह सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं का अलग-अलग अध्ययन  नहीं करता है बल्कि वह इसके सामान्य नियमों और प्रेरक शक्तियों के कार्य-स्वरूपों एवं विकास की खोज करता है।
  • ऐतिहासिक भौतिकवाद सामाजिक जीवन को सम्पूर्ण रूप में देखता है तथा उसके सभी पहलुओं और अंतर्विरोधों के आंतरिक सम्बंधों पर ध्यान देता है।
  • मार्क्स के अनुसार चूंकि किसी युग या समाज में उत्पादन का तरीका स्थिर नहीं रहा है बल्कि तकनीकी विकास के फलस्वरुप इसमें परिवर्तन होता रहा है। फलत: उसी के अनुरूप सामाजिक संबंधों तथा अति संरचना में परिवर्तन संभव हो जाता है।
  • मार्क्स के अनुसार इतिहास के किसी भी युग में समाज के आर्थिक संबंध समाज की प्रगति का रास्ता तैयार करने तथा राजनीतिक सामाजिक बौद्धिक एवं नैतिक संबंधों के स्वरुप को निर्धारित करने में सबसे अधिक प्रभाव डालते हैं।
  • मार्क्स के अनुसार इतिहास के भिन्न -भिन्न युगों में प्रचलित उत्पादन का तरीका भिन्न भिन्न प्रकार के सामाजिक विन्यास को जन्म देते हैं जिसकी पहचान दास प्रथा समाज, सामंती समाज एवं पूंजीवादी समाज के रूप में की गई है।
  • मानव अस्तित्व को बनाए रखने के लिए आवश्यक भौतिक वस्तुओं के उत्पादन का तरीका ही किसी समाज का आधार होता है और उसी के अनुरूप समाज के अन्य पक्ष- जैसे राजनीतिक, धार्मिक, नैतिक, सांस्कृतिक आदि जिन्हें मार्क्स अधिसंरचना की संज्ञा देते है निर्धारित होते हैं।
  • मार्क्स ने हीगल के द्वंदात्मक आदर्शवाद के सिद्धांत को अस्वीकार किया और इसको उल्टा करते हुए समाज के विश्लेषण में भौतिकवादी दृष्टिकोण को अपनाया और कहा कि मानव की उत्पत्ति के साथ एक आधारभूत आवश्यकता यह रही है कि मानव जीवित रहे ताकि वह इतिहास की रचना कर सके।
  • मार्क्स का मानना है कि उत्पादन की शक्ति में विकास के साथ जब जीवन निर्वाह उत्पादन से अतिरिक्त उत्पादन आरंभ हुआ तो दास युग का आरंभ हुआ और उसी के अनुरूप समाज के अन्य पक्ष निर्मित हो गए।
  • मार्क्स के अनुसार क्योंकि उत्पादन की शक्तियां निरंतर विकासमान है फलत: पूंजीवादी समाज में भी परिवर्तन अवश्य होगा और फिर यह समाज भी साम्यवाद समाज के रूप में बदल जाएगा।
  • ऐतिहासिक भौतिकवाद इतिहास से इस मायने में भिन्नता रखता है कि यह न तो घटनाओं का सिलसिलेवार ऐतिहासिक अध्ययन है और न ही यह किसी जनता विशेष या देश विशेष का अध्ययन करता है बल्कि यह सिद्धांत सम्पूर्ण समाज का अध्ययन करता है।

आलोचनात्मक मूल्यांकन:

  1. फ्रेडरिक जेमेसन का कहना है कि मार्क्स ने अपने ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत में संस्कृति को अर्थव्यवस्था पर आधारित माना है जबकि आधुनिक पूंजीवाद में संस्कृति अर्थव्यवस्था का प्रमुख अंग बन चुकी है जिसकी व्याख्या मार्क्स के विचारों से नहीं होती है।
  2. मार्क्स ने साम्यवादी अवस्था को ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया की अंतिम अवस्था बताया और भविष्यवाणी की कि इस अवस्था में उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व स्थापित हो जाएगा । परंतु रूस, चीन और अन्य साम्यवादी देशों के अब तक के व्यवहारिक अनुभव इस तथ्य को गलत साबित करते हैं।
  3. मार्क्स ने समाज को एक संरचना के रूप में देखा है जहां सामाजिक संरचना के सभी पक्ष एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।
  4. अल्थ्यूजर का मानना है कि समाज को संरचना के रूप में देखने के बावजूद मार्क्स द्वारा अर्थव्यवस्था को आधार के रूप में स्वीकार करना और अवैज्ञानिक है क्योंकि संरचना के सभी तत्व ना केवल एक दूसरे से जुड़े होते हैं बल्कि सभी एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं।
  5. मार्क्स ने मनुष्य को सिर्फ आर्थिक प्राणी के रूप में देखा है जो मनुष्य के सृजनशील प्रवृति के विपरीत है और यह सही नहीं है।
  6. ‘मानव का संबंध सिर्फ पेट भर रोटी से है और यह रोटी उत्पादित करना ही उसका ऐतिहासिक कार्य है’ मार्क्स का विचार उसे एकपक्षीय विश्लेषणकर्ता बना देता है।
  7. भौतिकवादी दृष्टिकोण पर उनकी अत्याधिक निर्भरता उनके वैचारिक दृष्टिकोण की सबसे बड़ी कमजोरी रही है क्योंकि समाज के अन्य पक्ष -जैसे धर्म, शिक्षा, राज्य आदि भी है जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से अर्थव्यवस्था एवं समाज के सभी पक्षों को प्रभावित कर के सामाजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

ऐतिहासिक भौतिकवाद: वर्तमान संदर्भ

ऐतिहासिक भौतिकवाद  के अप्रासंगिक तत्व:

  1. मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद का सिद्धांत इतिहास को शोषण एवं वर्ग संघर्ष के रूप में देखता है जिसका कारण उत्पादन प्रणाली और उत्पादन संबंधों में निहित अंतर्विरोध एवं तनाव होता है
    • मार्क्स की यह धारणा भी वर्तमान समाज की यथार्थता के केवल एक पक्ष को दर्शाती है वेबर के अनुसार वर्तमान समाज पदार्थ आर्थिक सुधार है यह सहयोग एवं पारस्परिक निर्भरता पर आधारित है आर्थिक सामाजिक राजनीतिक सभी क्षेत्र में आज विभिन्न देशों एवं सामाजिक के बीच सहयोग डिस्ट्रिक्ट हो रहा है जैसे यूरोपियन यूनियन और आसियान आर्थिक संघ सहयोग पर ही आधारित है ।
  2. ऐतिहासिक भौतिकवाद की यह मान्यता की आर्थिक विकास के साथ साथ शोषण बढ़ता जाता है वर्तमान समाज में पूरी तरह लागू नहीं होता है।
    • कुछ हद तक यह सही है कि आधुनिक पूंजीवाद ने आर्थिक विषमता में वृद्धि की है, परंतु दुनिया के लगभग सभी देशों में आर्थिक विकास के साधन निम्न वर्गों का विकास हुआ है और मध्यम वर्ग का विस्तार हुआ है।
  3. जहां तक संघर्ष एवं शोषण का सवाल है तो वर्तमान समाज में यह भी केवल आर्थिक तत्व पर आधारित नहीं है –जैसे श्रीलंका में तमिल सिंह ली, पाकिस्तान में शिया सुन्नी, भारत में हिंदू मुसलमान या या अमेरिका में प्रजाति है।
  4. ऐतिहासिक भौतिकवाद की मान्यता है की अर्थव्यवस्था या उत्पादन प्रणाली ही व प्रेरक तत्व है जो सामाजिक परिवर्तन को या इतिहास को आगे बढ़ाता है।
    • वर्तमान समाज के संदर्भ में यह मान्यता पूरी तरह सत्य नहीं है गुन्नार मिर्डल ने बताया है कि आज राज्य एक ऐसा महत्वपूर्ण साधन है जो वर्तमान सामाजिक परिवर्तन एवं विकास हेतु प्रमुख रूप से उत्तरदायित्व है।
  5. मार्क्स की यह मान्यता कि आर्थिक तत्वों में विद्यमान अंतर्विरोध संघर्ष और क्रांति को उत्पन्न कर समाज का आमूलचूल परिवर्तन करेगा, आज भी अप्रासंगिक लग रहा है।

 

ऐतिहासिक भौतिकवाद के प्रासंगिक तत्व:

  1. मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत में इतिहास के अंतिम अवस्था के रूप में साम्यवाद को प्रस्तुत करके समाज के नीति निर्माताओं के समक्ष समकालीन सामाजिक व्यवस्था के नकारात्मक पक्ष को दूर करने और सामाजिक परिवर्तन को दिशा देने हेतु अभिप्रेरक विचारधारा के रूप में आज भी क्रियाशील है।
  2. आज वैश्विक आतंकवाद या नेपाल में हो रहे हैं माओवादी संघर्ष आदि के मूल में आर्थिक पिछड़ापन, असमानता या गरीबी जैसे तत्व प्रमुख रहे हैं जो इस सिद्धांत के समकालीन प्रासंगिकता को दर्शाते हैं।
  3. विकासशील समस्याओं में नई आर्थिक नीतियों ने आर्थिक विषमता को बढ़ाकर कई रूपों में वर्ग संघर्ष को बढ़ा दिया है।
  4. 1991 में भारत सरकार द्वारा अपनी आर्थिक नीति में किए गए परिवर्तन इन देशों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, कानूनी सभी पक्षों को क्रांतिकारी रूप से बदल दिया है।

 

निष्कर्ष:

मार्क्स का यह सिद्धांत व्यवहारिक रुप से वर्तमान समाज पर भले ही पूरी तरह लागू न होता हो, परंतु एक विचारधारा, एक दृष्टिकोण, या एक पद्धतिशास्त्र के रूप में सामाजिक यथार्थता के कई महत्वपूर्ण पक्षों को उजागर करने और उसके नकारात्मक पक्षों को दूर करने में आज भी सहायक है।

 

Advertisements

YDSEdu View All

YDSEdu is an online blog for all students who are preparing for competitive exams. Here in this blog we analyse most important issues relevant for examination.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

w

Connecting to %s

%d bloggers like this: